Saturday, 1 July 2023

आज फिर देखी वही श्रद्धांजलि ।

आज फिर देखी वही श्रद्धांजलि, 

सर झुकाए दे रहे उनके शवों पर ।

किंचित् एक श्रद्धांजलि की आड़ में वे,

मुक्ति मातृ रक्षा से भी चाहते है । 


वीरता के भाव का उपहास करके,

छाँव उसके शौर्य की जिसमे सुरक्षित ।

वातानुकूलित घरों और कार्यालयों में,

देश को दीमक से खाते जा रहें हैं ।


कौन देखेगा शैकत का समंदर,

जो उबलता जेठ की हर दोपहर में ।

वे अडिग से खोजते है दुश्मनों को,

ध्यान भी ना जाता जलते चर्म पर जब,

मातृ रक्षा के निमित पग धारते हैं ।


और समझेगा कौन उनके भाव को जो,

गल गए या दबे वर्फ़ की आँधियों में ।

पर ना छोड़ा आपको उसने कभी भी,

सोचना पड़ जाये जीवन को बचाते ।


जो चली है गोलियाँ इस राष्ट्र पर - तुमपर,

वो सभी है खायी अपने वक्ष पर ज्यो।

और छोड़ा है धरा को इस तरह से,

शौर्य की स्याही का ज्यों उपयोग करके,

कर्ज माँ का जैसे कोई बच्चा उतारे।


तो कभी जब बैठे हों उन्माद में हम,

स्वयं से नीचा सभी को देखने में ।

कोई हक़ बनता नहीं कुछ बोलने का,

प्राण आहुति देके जिसने मोल ली हो,

हम सभी लोगों के जीवन की सुरक्षा ।

हैं गिने हुए ये सारे दिन और साँसे ।

हैं गिने हुए ये सारे दिन और साँसे,

जिनको तुम जीवन कहते हो ।

है लिखा हुआ संदेश तुम्हारे माथे,

फिर भी प्रलाप कर मरते हो ।


ये नहीं सहज जैसा तुमने सोचा होगा ,

ये नहीं सरल जैसा चाहो वैसा ढालो ।

ये फल है उसका जो बोते रहते हो हरपल,

पर निश्चय ये सदियों पहले बोया होगा ।


जब काँटे बोए तो फिर असहज क्यों हो ,

क्या कभी कृषक रोया उन्नत फसलों पर ।

अब उस आनंद को सोच सोच कर भोगों,

एक एक निवाला अपनी उन फसलों का ।


पर जो फल कड़वे मिले इस थाली में ,

उनके बीजों को कभी नहीं तुम बोना ।

पर गर बो दिया है फिर से,

ये पता नहीं कब कब पड़ेगा रोना ।

लेकर सब आशाओं की किरने सो जायें ।

लेकर सब आशाओं की किरने सो जायें ।

स्वप्नों के महलों के नरेश बन जायें ।

इच्छाओ की इस भीषण मृगतृष्णा में ।

अंगार उठाकर कहाँ कहाँ ले जाये ।


अगनित सतहों में ओट कर बैठी ।

जीवन की निर्झर स्नेह लता की सुरभि । 

पर स्वप्नों के तुम हो स्वप्नेश स्वयं ही ।

तुम वह बन सकते हो जैसा चाहो ।


तो क्या कोई बनना चाहेगा असफल ।

या कोई आतंकी बनना चाहेगा । 

या कोई ईर्ष्या कर स्वयं को -

जला जला मारेगा ।


या फिर वह बनना चाहेगा नायक ।

या वो सबका रक्षक बन छाएगा ।

या वो अपनी मुश्कान से -

बड़े बड़े कष्टों को टालेगा ।


क्या वो आशीर्वचन चाहेगा ।

या गाली खा मुस्कायेगा ।

या सबका लाड़ला बनेगा ।

या फिर छुपता रह जाएगा ।


वैसे कुछ नहीं अलग है ।

ये स्वप्न और ये जीवन ।

जो जैसा भी चाहेगा ।

वो वैसा बन जाएगा ।


पर धैर्य नहीं खोना होगा ।

इच्छित कर्म करना होगा ।

ये स्वप्न नहीं जीवन है ।

कुछ तो बिलम्ब होगा ही ।


पर धैर्य तुम्हारा इक दिन ।

वो दिन लेकर आयेगा ।

जो स्वप्नों में सोचा था ।

वो भी सच हो जाएगा ।

माँ क्यों चुप है।

माँ क्यों चुप है, 

क्यों नहीं वही लाली उसके चेहरे पर है,

जो बनी रही माँ ने जबसे तुमको देखा,

और रही तुम्हारे बचपन के छिन जाने तक ।


क्या मेरा अंश नहीं होगा मेरे जैसा,

क्या मेरे अंग बिरोध करेंगे मेरा ही,

क्या वो भी साथ नहीं देगा जग में,

पाला है जिसको सिंचित कर निज शोणित से।


क्या तिरस्कार उस अवयव से मिल सकता है,

जिसको मान का अर्थ समझाया बैठाकर,

क्या जिसको चलना सिखलाया है मैंने,

क्या वो भी जा सकता है मेरा हाथ झिड़ककर।


क्या मैंने जिसकी रक्षा की इस जीवन भर,

क्या वो भी छोड़ चला जाएगा शत्रु समीप,

क्या मनुज नहीं है बो जिसको जन्मा मैंने,

क्या ईश्वर है ही नहीं कही सारे जग में ।


क्या जिसको सींचा हृदय क्षीर का पान कराकर,

क्या वो भी ना पूछेगा क्या खाया है माँ,

क्या वो भी ना आएगा सुध लेने को मेरी,

जिसकी सुध में ही जीवन मेरा बीत गया।


नहीं नहीं ऐसा कुछ भी मैं ना सोचू ,

ना नहीं नहीं ऐसा ना है कुछ मेरे साथ,

मेरा अंश सदैव सदैव ही है मेरा,

शायद ये बुद्धि ही साथ नहीं देती मेरा।


जो सोच लिया विरोध किया है उसने,

उसने तो बस मुझको समझाया ही होगा,

वो साथ नहीं इसका मतलब ये ही तो नहीं,

वो मेरी गरज नहीं कभी नहीं करता होगा।


ना ना अरे वो नहीं रहा होगा अपमान,

हूँ मूढ़ बुद्धि मुझको ही है कम ज्ञान,

पर हाथ तो मेरा झिड़का था ही उसने,

पर शायद वो उस वक़्त कही फिसला होगा,

नहीं नहीं ऐसा कुछ भी मैं ना सोचूँ,

ना नहीं नहीं ऐसा ना कुछ है मेरे साथ।


ना छोड़ा होगा उसने बस भर शत्रु समीप,

क्या पता जतन क्या-क्या बच्चा करता होगा,

वह निश्चय ही आ जाएगा मेरी रक्षा को, 

वह अंश अंश और कण कण भर बस मेरा है ,

नहीं नहीं ऐसा कुछ भी मैं ना सोचू ,

ना नहीं नहीं ऐसा ना है कुछ मेरे साथ।


पर भूख तो लगी है मुझको कल से ही है,

है मैंने बतलाया भी था उसको कई बार,

फिर क्यों ना आया ना कुछ भेजा किसी के हाथ,

अब क्या समझूँ वो भूल गया होगा। 

वैसे ही हैं काम बहुत इस दुनिया में, 

शायद थक कर कहीं सोया होगा ।


नहीं नहीं ऐसा कुछ भी मैं ना सोचू ,

ना नहीं नहीं ऐसा ना है कुछ मेरे साथ। 

है मृत्यु सत्य व असत् शेष ।

है मृत्यु सत्य व असत् शेष,

है जगत जाल एक अंधकार,

रिश्ते नाते सब मोह जाल,

हैं लेन-देन के व्यस्त मार्ग।


नित हर लेते हर तर्क शास्त्र,

देते प्रलोभ का मकड़जाल,

दे पद - धन का बैभव अपार,

कर देते बुद्धि का विनाश ।


वह ज्ञानवान जो बुद्धिपूर्ण,

उठ चला हेतु को परम लक्ष्य,

जिस हेतु मिला वर में उसको,

मानव रूपी यह दिव्य रूप ।


कर लेने को वह अश्वमेध,

भोगने हेतु संपूर्ण राज्य,

वह काम, क्रोध व अहंकार,

वह अधम कृत्य, पापी विचार,

वह अतुष्ट भाव सम महामूर्ख,

वह विनयहीन वह लोभ राग ।

कर विजित इन्हें ही है भोगा,

उसने जीवन व परम धाम ।


जीवन जीने का सरल मार्ग,

फिर भी चुनते जो त्याज्य भाव,

वो पाते क्षण भर का प्रमाद, 

ना परम प्राप्ति ना जीवन सुख,

वो जाते दुश्चक्रों के द्वार ।

वो नाराज़ था आज ।

वो नाराज़ था आज,

या कल भी,

अभी तो ठीक ही था सब ।

कैसे बुरी लगती है वही बात, 

जिसपर हंसे थे कुछ ही दिन पहले ।


शायद जुड़े थे इस बात के तार, 

कुछ ख़ुशियों और ग़म से।

सोच ही लिया की ना आये ज़िक्र फिर से, 

भावना कौन सी उमड़े सुनते ही ।


चलो नई बात करे अब, 

दफ़्न कर दें जो भी पुराना है ।

जिनसे जुड़े है दर्द के तार, 

माना कुछ है इनमें अच्छा याद करने को, 

पर ग़म और ख़ुशी के उलझे तारों को छेड़े क्यों,  

क्यों ना आगे सिर्फ़ ख़ुशियाँ लिखें ।


फिर जब याँदें आयेंगी, बातें होंगी, तो ये गमों से ना जुड़ पायेंगी ।


ख़ुशी और ख़ुशी लाएगी ।

Sunday, 6 October 2019

सूर्य वंदन

इष्ट तुम्हारा आराधन है, इष्ट तुम्हारा ही वंदन।  
सहस्त्र ज्योति की ललनाओं से, इष्ट तुम्हारा अर्पण-तर्पण।। 

सप्त वर्ण के प्रतिनिधि अश्वो का मैराथन।  
सप्त सुरों के वंधन से है जिनका साजन।। 
सप्त प्रदीपित दिव्य ज्योति का प्रस्फुट विकिरण।
 सप्त शक्ति के इष्ट तुम्हारा आराधन।।  

नीलाम्बर पर विचरण करते हे दिव्य देव तुम।  
सृष्टि  से तम  का विनाश प्रतिपल करते तुम।।
आशीर्वचन बोल कर तुम मुझको भी किंचित।  
नवल प्रात का सृजन करो मस्तक के अंतर।।

नवदीपित यह आत्मशक्ति तारों को छू ले।  
आलोक संघनित हो इतना की ताम सर्वश्व नष्ट कर दे।। 
ऊर्जस्वित हो जाये अवयव कूट-कूट कर।  
वृष्टि बने, बरसे बन जीवन प्राण गति सम।।
आह्लादित्त  कणिका रूपी दिव्य सखी बन। 
करती जाये जब - जब मेरा आलिंगन।। 

शतपथ चलूँ साध्य लक्ष्य धारण कर लूँ। 
कर्मठ जीवन का अभिप्रेत पालन कर लूँ।।
तम में गर भटके मेरा कण सा आस्तित्व। 
दीप दिखा कर मार्ग सुझा देना प्रिय मित्र।।

देव तुम्ही हो प्राण शक्ति के साधन मेरे। 
एक तुम्ही हो दिव्य ज्योति से दीपक मेरे।।
प्राण पल्लवित होता गर जीवन की नैया। 
नविक रूपी पा लेती तेरा पथदर्शन।।

साधक हूँ अनुराग यही मेरा जीवन।
प्रेम प्राप्ति की आकुलता ही मेरा चिंतन।।
हृदय ज्वार का बाँध कभी टूटे गर विचलित। 
संभव न हो तेरी मुखकृति  के जब दर्शन। 

पर्वतमाला के शिखरों से ओटित उदयन। 
दिव्य रश्मियों से तेरे अवसान विकीर्णन।।
उदय सत्य का, उदय तिमिर गति का अति मंदन।
उदयित तेज प्रकाश पुरुष तेरा अभिनन्दन।।

देव उदय ही तेरा तम पर विजय विनियमन। 
उदय पूर्व ही तम का तुझको राज्य प्रत्यर्पण।।
प्रात काल की मधुरिम  बेला में तब करते। 
श्वेत कमल दल खिल - खिल तेरा आराधन।।

पत्रों पर औंस की बूंदों से हो निर्झर।
उदय ;काल की शोभा बन - बन जाती उज्जवल।।  
माणिक सम दीपित बूंदों  दिव्य वियोजन। 
आरति करता पवन वेग में, पत्रों का अनुदोलन।।

मिहिर प्रताप विखंडित, विस्मृत, विलग, विकाल। 
मिहिर तेज सम दीपित क्या कोई विश्वास।।
मिहिर रश्मियों से निकसित अनुदित कृति दीप्ति। 
मिहिर दीप्ति की मृदु छाया में होती नवकुल सृष्टि।।

मध्य दिवस का तेरा वह विकराल उद्वेलन। 
शक्ति परिक्षण  सा करता तेरी रश्मियों का अनुतापन।।
 विकलित अनुकम्पन सा हो जब  व्याप्त। 
अखिल जगत का स्वामी जब - जब करे सबल प्रतिघात।।